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Wednesday, 23 November 2016

वैदिक साहित्य-अथर्ववेद

अथर्ववेद

-अथर्ववेद की ‘रचना’ अर्थवा झषि ने की थी ।

-अथर्ववेद के अधिकांश मंत्रों का संबंध तंत्र-मंत्र या जादू-टोने से है।

-रोग निवारण की औषधियों की चर्चा भी इसमें मिलती है।

-अथर्ववेद के मंत्रों को भारतीय विज्ञान का आधार भी माना जाता है।

-अथर्ववेद में सभा तथा समिति को प्रजापति की दो पुत्रियां कहा गया है।

-सर्वोच्च शासक को अथर्ववेद में एकराट् कहा गया है। सम्राट शब्द का भी उल्लेख मिलता है।

-सूर्य का वर्णन एक ब्राह्मण विद्यार्थी के रूप में किया गया है।

-उपवेद, वेदों के परिशिष्ट हैं जिनके जरिए वेद की तकनीकी बातों की स्पष्टता मिलती है।

-वेदों की क्लिष्टता को कम करने के लिए वेदांगों की रचना की गई ।

-शिक्षा की सबसे प्रामाणिक रचना प्रातिशाख्य सूत्र है ।

-व्याकरण की सबसे पहल तथा व्यापक रचना पाणिनी की अष्टाध्यायी है।

-ऋषियों द्वारा जंगलों में रचित ग्रंथों को आरण्यक कहा जाता है।

-वेदों की दार्शनिक व्याख्या के लिए उपनिषदों की रचना की गई ।

-उपनिषदों को वेदांत भी कहा जाता है।

-उपनिषद का शाब्दिक अर्थ है एकान्त में प्राप्त ज्ञान ।

-यम तथा नचिकेता के बीच प्रसिद्ध संवाद की कथा कठोपनिषद् में वर्णित है।

-श्वेतकेतु एवं उसके पिता का संवाद छान्दोग्योपनिषद में वर्णित है।

-भारत का सूत्र वाक्य सत्यमेव जयते मुण्डकोपनिषद् से लिया गया है।

वैदिक साहित्य-यजुर्वेद

यजुर्वेद

यजुर्वेद में अनुष्ठानों तथा कर्मकांडों में प्रयुक्त होने वाले श्लोकों तथा मंत्रों का संग्रह है।
इसका गायन करने वाले पुरोहित अध्वर्यु कहलाते थे ।

यजुर्वेद गद्य तथा पद्य दोनों में रचित है। इसके दो पाठान्तर हैं- 1.कृष्ण यजुर्वेद 2. शुक्ल यजुर्वेद
कृष्ण यजुर्वेद गद्य तथा शुक्ल यजुर्वेद पद्य में रचित है।
यजुर्वेद में राजसूय, वाजपेय तथा अश्वमेघ यज्ञ की चर्चा है।
यजुर्वेद में 40 मंडल तता 2000 ऋचाएं(मंत्र) है।
सामवेद :-

-सामवेद में अधिकांश श्लोक तथा मंत्र ऋग्वेद से लिए गए हैं।​

-सामवेद का संबंद संगीत से है।

-इस वेद से संबंधित श्लोक और मंत्रों का गायन करने वाले पुरोहित उद्गातृ कहलाते थे ।

-इसमें कुल 1549 श्लोक हैं। जिसमें 75 को छोड़कर सभी ऋग्वेद से लिए गए हैं।

-सामवेद में मंत्रों की संख्या 1810 है।

वैदिक साहित्य-ऋग्वेद

वैदिक साहित्य

ऋग्वेद :-

-श्रुति साहित्य में वेदों का प्रथम स्थान है। वेद शब्द ‘विद’ घातु से बना है , जिसका अर्थ है ‘जानना’

-वेदों से आर्यों के जीवन तथा दर्शन का पता चलता है ।

-वेदों की संख्या चार है। ये हैं- ऋग्वेद, यजुर्वेद, समावेद और अर्थवेद ।

-वेदों को संहिता भी कहा जाता है।

-वेदों के संकलन का श्रेय महर्षि कृष्ण द्वैपायन वेद-व्यास को है ।

-ऋग्वेद में 10 मण्डलों में विभाजित है। इसमें देवताओं की स्तुति में 1028 श्लोक हैं। जिसमें 11 बालखिल्य श्लोक हैं ।

-ऋग्वेद में 10462 मंत्रों का संकलन है।

-प्रसिद्ध गायत्री मंत्र ऋग्वेद के चौथे मंडल से लिया गया है।

-ऋग्वेद का पहला ताथा 10वां मंडल क्षेपक माना जाता है ।

-नौवें मंडल में सोम की चर्चा है।

-आठवें मंडल में हस्तलिखित ऋचाओं को खिल्य कहा जाता है।

-ऋग्वेद में पुरुष देवताओं की प्रधानता है । 33 देवताओं का उल्लेख है।

-ऋग्वेद का पाठ करने वाल ब्राह्मण को होतृ कहा जाता था ।

-देवताओं में सबसे महत्वपूर्ण इंद्र थे ।

-ऋग्वेद में दसराज्ञ युद्ध की चर्चा है।

-उपनिषदों की कुल संख्या 108 है।

-वेदांग की संख्या 6 है।

-महापुराणों की संख्या 18 है।

-आर्यों का प्रसिद्ध कबीला भरत था ।ज

-जंगल की देवी के रूप में अरण्यानी का उल्लेख ऋग्वेद में हुआ है।

-बृहस्पति और उसकी पत्नी जुही की चर्चा भी ऋग्वेद में मिलती है।

-सरस्वती ऋग्वेद में एक पवित्र नदी के रूप में उल्लिखित है। इसके प्रवाह-क्षेत्र को देवकृत योनि कहा गया है।

-ऋग्वेद में धर्म शब्द का प्रयोग विधि(नियम) के रूप में किया गया है।

-ऋग्वेद की पांच शाखाएं हैं- वाष्कल, शाकल, आश्वलायन, शंखायन और माण्डुक्य

-अग्नि को पथिकृत अर्थात् पथ का निर्माता कहा जाता था ।

स्मृति साहित्य

स्मृति साहित्य :-

मनु स्मृति सबसे पुरानी स्मृति ग्रंथ है।

हिंदु धर्म में स्मृति ग्रंथों का सर्वाधिक प्रभाव है।

इसमें सामान्य जीवन के आचार-विचार तथा नियमों की चर्चा है।

पुराणों के संकलन का श्रेय वेदव्यास को जाता है। पुराणों की संख्या 18 है।

सबसे प्राचीन पुराण मत्स्य पुराण है जिसमें विष्णु के दस अवतारों की चर्चा है।

रामायण और महाभारत धर्मशास्त्र की श्रेणी में आते हैं।

रामायण की रचना महर्षि वाल्मीकि ने की थी । रामायण 7 काण्डों में विभक्त है।

महाभारत की रचना वदेव्यास ने की थी ।
इसमें कौरव तथा पांडवों के बीच युद्ध का वर्णन है।
महाभारत 18 पर्वों में विभक्त है ।

इसे जयसंहिता या शतसाहस्त्र संहिता भी कहा जाता है।

श्रीमदभागवत गीता महाभारत के भीष्म पर्व का अंश है।

वाक्यांश के लिए एक शब्द

वाक्यांश के लिए एक शब्द

      अच्छी रचना के लिए आवश्यक है कि कम से कम शब्दोँ मेँ विचार प्रकट किए जाएँ। भाषा मेँ यह सुविधा भी होनी चाहिए कि वक्ता या लेखक कम से कम शब्दोँ मेँ अर्थात् संक्षेप मेँ बोलकर या लिखकर विचार अभिव्यक्त कर सके। कम से कम शब्दोँ मेँ अधिकाधिक अर्थ को प्रकट करने के लिए ‘वाक्यांश या शब्द–समूह के लिए एक शब्द’ का विस्तृत ज्ञान होना आवश्यक है। ऐसे शब्दोँ के प्रयोग से वाक्य–रचना मेँ संक्षिप्तता, सुन्दरता तथा गंभीरता आ जाती है।

     कुछ उदाहरण निम्नलिखित हैँ–
वाक्यांश या शब्द–समूह -- शब्द
• हाथी हाँकने का छोटा भाला— अंकुश
• जो कहा न जा सके— अकथनीय
• जिसे क्षमा न किया जा सके— अक्षम्य
• जिस स्थान पर कोई न जा सके— अगम्य
• जो कभी बूढ़ा न हो— अजर
• जिसका कोई शत्रु न हो— अजातशत्रु
• जो जीता न जा सके— अजेय
• जो दिखाई न पड़े— अदृश्य
• जिसके समान कोई न हो— अद्वितीय
• हृदय की बातेँ जानने वाला— अन्तर्यामी
• पृथ्वी, ग्रहोँ और तारोँ आदि का स्थान— अन्तरिक्ष
• दोपहर बाद का समय— अपराह्न
• जो सामान्य नियम के विरुद्ध हो— अपवाद
• जिस पर मुकदमा चल रहा हो/अपराध करने का आरोप हो/अभियोग लगाया गया हो— अभियुक्त
• जो पहले कभी नहीँ हुआ— अभूतपूर्व
• फेँक कर चलाया जाने वाला हथियार— अस्त्र
• जिसकी गिनती न हो सके— अगणित/अगणनीय
• जो पहले पढ़ा हुआ न हो— अपठित
• जिसके आने की तिथि निश्चित न हो— अतिथि
• कमर के नीचे पहने जाने वाला वस्त्र— अधोवस्त्र
• जिसके बारे मेँ कोई निश्चय न हो— अनिश्चित
• जिसका भाषा द्वारा वर्णन असंभव हो— अनिर्वचनीय
• अत्यधिक बढ़ा–चढ़ा कर कही गई बात— अतिशयोक्ति
• सबसे आगे रहने वाला— अग्रणी
• जो पहले जन्मा हो— अग्रज
• जो बाद मेँ जन्मा हो— अनुज
• जो इंद्रियोँ द्वारा न जाना जा सके— अगोचर
• जिसका पता न हो— अज्ञात
• आगे आने वाला— आगामी
• अण्डे से जन्म लेने वाला— अण्डज
• जो छूने योग्य न हो— अछूत
• जो छुआ न गया हो— अछूता
• जो अपने स्थान या स्थिति से अलग न किया जा सके— अच्युत
• जो अपनी बात से टले नहीँ— अटल
• जिस पुस्तक मेँ आठ अध्याय होँ— अष्टाध्यायी
• आवश्यकता से अधिक बरसात— अतिवृष्टि
• बरसात बिल्कुल न होना— अनावृष्टि
• बहुत कम बरसात होना— अल्पवृष्टि
• इंद्रियोँ की पहुँच से बाहर— अतीन्द्रिय/इंद्रयातीत
• सीमा का अनुचित उल्लंघन— अतिक्रमण
• जो बीत गया हो— अतीत
• जिसकी गहराई का पता न लग सके— अथाह
• आगे का विचार न कर सकने वाला— अदूरदर्शी
• जो आज तक से सम्बन्ध रखता है— अद्यतन
• आदेश जो निश्चित अवधि तक लागू हो— अध्यादेश
• जिस पर किसी ने अधिकार कर लिया हो— अधिकृत
• वह सूचना जो सरकार की ओर से जारी हो— अधिसूचना
• विधायिका द्वारा स्वीकृत नियम— अधिनियम
• अविवाहित महिला— अनूढ़ा
• वह स्त्री जिसके पति ने दूसरी शादी कर ली हो— अध्यूढ़ा
• दूसरे की विवाहित स्त्री— अन्योढ़ा
• गुरु के पास रहकर पढ़ने वाला— अन्तेवासी
• पहाड़ के ऊपर की समतल जमीन— अधित्यका
• जिसके हस्ताक्षर नीचे अंकित हैँ— अधोहस्ताक्षरकर्त्ता
• एक भाषा के विचारोँ को दूसरी भाषा मेँ व्यक्त करना— अनुवाद
• किसी सम्प्रदाय का समर्थन करने वाला— अनुयायी
• किसी प्रस्ताव का समर्थन करने की क्रिया— अनुमोदन
• जिसके माता–पिता न होँ— अनाथ
• जिसका जन्म निम्न वर्ण मेँ हुआ हो— अंत्यज
• परम्परा से चली आई कथा— अनुश्रुति
• जिसका कोई दूसरा उपाय न हो— अनन्योपाय
• वह भाई जो अन्य माता से उत्पन्न हुआ हो— अन्योदर
• पलक को बिना झपकाए— अनिमेष/निर्निमेष
• जो बुलाया न गया हो— अनाहूत
• जो ढका हुआ न हो— अनावृत
• जो दोहराया न गया हो— अनावर्त
• पहले लिखे गए पत्र का स्मरण— अनुस्मारक
• पीछे–पीछे चलने वाला/अनुसरण करने वाला— अनुगामी
• महल का वह भाग जहाँ रानियाँ निवास करती हैँ— अंतःपुर/रनिवास
• जिसे किसी बात का पता न हो— अनभिज्ञ/अज्ञ
• जिसका आदर न किया गया हो— अनादृत
• जिसका मन कहीँ अन्यत्र लगा हो— अन्यमनस्क
• जो धन को व्यर्थ ही खर्च करता हो— अपव्ययी
• आवश्यकता से अधिक धन का संचय न करना— अपरिग्रह
• जो किसी पर अभियोग लगाए— अभियोगी
• जो भोजन रोगी के लिए निषिद्ध है— अपथ्य
• जिस वस्त्र को पहना न गया हो— अप्रहत
• न जोता गया खेत— अप्रहत
• जो बिन माँगे मिल जाए— अयाचित
• जो कम बोलता हो— अल्पभाषी/मितभाषी
• आदेश की अवहेलना— अवज्ञा
• जो बिना वेतन के कार्य करता हो— अवैतनिक
• जो व्यक्ति विदेश मेँ रहता हो— अप्रवासी
• जो सहनशील न हो— असहिष्णु
• जिसका कभी अन्त न हो— अनन्त
• जिसका दमन न किया जा सके— अदम्य
• जिसका स्पर्श करना वर्जित हो— अस्पृश्य
• जिसका विश्वास न किया जा सके— अविश्वस्त
• जो कभी नष्ट न होने वाला हो— अनश्वर
• जो रचना अन्य भाषा की अनुवाद हो— अनूदित
• जिसके पास कुछ न हो अर्थात् दरिद्र— अकिँचन
• जो कभी मरता न हो— अमर
• जो सुना हुआ न हो— अश्रव्य
• जिसको भेदा न जा सके— अभेद्य
• जो साधा न जा सके— असाध्य
• जो चीज इस संसार मेँ न हो— अलौकिक
• जो बाह्य संसार के ज्ञान से अनभिज्ञ हो— अलोकज्ञ
• जिसे लाँघा न जा सके— अलंघनीय
• जिसकी तुलना न हो सके— अतुलनीय
• जिसके आदि (प्रारम्भ) का पता न हो— अनादि
• जिसकी सबसे पहले गणना की जाये— अग्रगण
• सभी जातियोँ से सम्बन्ध रखने वाला— अन्तर्जातीय
• जिसकी कोई उपमा न हो— अनुपम
• जिसका वर्णन न हो सके— अवर्णनीय
• जिसका खंडन न किया जा सके— अखंडनीय
• जिसे जाना न जा सके— अज्ञेय
• जो बहुत गहरा हो— अगाध
• जिसका चिँतन न किया जा सके— अचिँत्य
• जिसको काटा न जा सके— अकाट्य
• जिसको त्यागा न जा सके— अत्याज्य
• वास्तविक मूल्य से अधिक लिया जाने वाला मूल्य— अधिमूल्य
• अन्य से संबंध न रखने वाला/किसी एक मेँ ही आस्था रखने वाला— अनन्य

Wednesday, 3 August 2016

Important Question of Hindi Vyakaran for RPSC Teacher Exams

भाषा,लिपि और व्याकरण

भाषा

मनुष्य ,अपने भावों तथा विचारों को दो प्रकार ,से प्रकट करता है-

बोलकर (मौखिक )लिखकर (लिखित)मौखिक भाषा :- मौखिक भाषा में मनुष्य अपने विचारों या मनोभावों को बोलकर प्रकट करते है।लिखित भाषा:-भाषा के लिखित रूप में लिखकर या पढ़कर विचारों एवं मनोभावों का आदान-प्रदान किया जाता है।

हिन्दी वर्णमाला

स्वर :- अ आ इ ई उ ऊ ए ऐ ओ औ अं अः ऋ ॠ

व्यंजन :-

क ख ग घ ङ

च छ ज झ ञ

ट ठ ड ढ ण

त थ द ध न

प फ ब भ म

य र ल व

स श ष ह

क्ष त्र ज्ञ

लिपि:-

लिपि का शाब्दिक अर्थ होता है -लिखित या चित्रित करना । ध्वनियों को लिखने के लिए जिन चिह्नों का प्रयोग किया जाता है,वही लिपि कहलाती है।

प्रत्येक भाषा की अपनी -अलग लिपि होती है। हिन्दी की लिपि देवनागरी है। हिन्दी के अलावा -संस्कृत ,मराठी,कोंकणी,नेपाली आदि भाषाएँ भी देवनागरी में लिखी जाती है।

व्याकरण :-

व्याकरण वह विधा है,जिसके द्वारा किसी भाषा का शुद्ध बोलना या लिखना जाना जाता है। व्याकरण भाषा की व्यवस्था को बनाये रखने का काम करते है।

व्याकरण भाषा के शुद्ध एवं अशुद्ध प्रयोगों पर ध्यान देता है। इस प्रकार ,हम कह सकते है कि प्रत्येक भाषा के अपने नियम होते है,उस भाषा का व्याकरण भाषा को शुद्ध लिखना व बोलना सिखाता है। व्याकरण के तीन मुख्य विभाग होते है :-

वर्ण -विचार :- इसमे वर्णों के उच्चारण ,रूप ,आकार,भेद,आदि के सम्बन्ध में अध्ययन होता है।शब्द -विचार :- इसमे शब्दों के भेद ,रूप,प्रयोगों तथा उत्पत्ति का अध्ययन किया जाता है।वाक्य -विचार:- इसमे वाक्य निर्माण ,उनके प्रकार,उनके भेद,गठन,प्रयोग, विग्रह आदि पर विचार किया जाता है।

हिन्दी संज्ञा

परिभाषा – संज्ञा का शाब्दिक अर्थ होता है : नाम। किसी व्यक्ति,वस्तु,स्थान तथा भाव के नाम को संज्ञा कहा जाता है अर्थात किसी व्यक्ति, स्थान, वस्तु आदि तथा नाम के गुण, धर्म, स्वभाव का बोध कराने वाले शब्द को संज्ञा कहते हैं। जैसे – श्याम, आम, मिठास, हाथी आदि।

संज्ञा के प्रकार :-

व्यक्तिवाचक संज्ञाजातिवाचक संज्ञाभाववाचक संज्ञासमूहवाचक संज्ञाद्रव्यवाचक संज्ञा

मुख्य रूप से संज्ञा तीन प्रकार की होती है’ –

व्यक्तिवाचक संज्ञा।जातिवाचक संज्ञा।भाववाचक संज्ञा।

व्यक्तिवाचक संज्ञा:- जिस शब्द से किसी एक विशेष व्यक्ति,वस्तु या स्थान आदि का बोध होता है, उसे व्यक्तिवाचक संज्ञा कहते है। राम

जातिवाचक संज्ञा :- जिस शब्द से एक ही जाति के अनेक प्राणियो या वस्तुओं का बोध हो ,उसे जातिवाचक संज्ञा कहते है। जैसे – कलम

भाववाचक संज्ञा :- जिस संज्ञा शब्द से किसी के गुण,दोष,दशा ,स्वभाव ,भाव आदि का बोध होता हो, उसे भाववाचक संज्ञा कहते है। जैसे -ईमानदारी

समूहवाचक संज्ञा :- जो संज्ञा शब्द किसी समूह या समुदाय का बोध कराते है, उसे समूहवाचक संज्ञा कहते है । जैसे -भीड़

द्रव्यवाचक संज्ञा :- जो संज्ञा शब्द ,किसी द्रव्य ,पदार्थ या धातु आदि का बोध कराते है, उसे द्रव्यवाचक संज्ञा कहते है। जैसे -,दूध ,पानी आदि।

Note - अगर आपके पास हिन्दी में अपना खुद का लिखा हुआ कोई Motivational लेख या सामान्य ज्ञान से संबंधित कोई साम्रगी या प्रतियोगी परीक्षाओं से संबंधित कोई भी साम्रगी है जो आप हमारी बेबसाइट पर पब्लिश कराना चाहते है तो क्रपया हमें rak.manth@gmail.com पर अपने फोटो व नाम के साथ मेल करें ! पसंद आने पर उसे आपके नाम के साथ पब्लिश किया जायेगा ! क्रपया कमेंट के माध्यम से बताऐं के ये पोस्ट आपको कैसी लगी आपके सुझावों का भी स्वागत रहेगा Thanks !

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